बघेलखण्ड के जनजातियों द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले पौधे: एक अध्ययन

 

स्कंद मिश्रा

वनस्पति विभाग, शासकीय नवीन विज्ञान महाविद्यालय, रीवा .प्र.

*Corresponding Author E-mail:  skandbt@gmail.com

 

सारांश

वनों एवं उनमें निवास करने वाली जनजातियों का एक दूसरे से निकटतम संबन्ध होता है। वनों के बिना जनजातियों के जीवन पद्धति की कल्पना नहीं की जा सकती है। यह काफी समय से वनों मे रहते रहें हैं तथा यहीं इनका घर होता है। वनों से इन्हें केवल भोजन, दवाईयाँ, ईधन आदि ही नहीं मिलता, बल्कि यह भावनात्मक रूप से जंगलों एवं पौधों से जुड़े होते हैं। इनके संस्कृति, गीत, संस्कार तथा जीवन पद्धति वनों के आस-पास होती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी क्रियाकलापों में यह वनों से जुड़े होते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वनों एवं जनजातियों का सहजीवी जीवन होता है। यदि जनजातियों के घरों के आस-पास वनों का अभाव होता है तो वह जंगलों में समय-समय पर जाकर अपने जरूरत के वस्तुओं को इकटठा करते हैं।प्रस्तुत शोध में बघेलखण्ड के वनों एवं उनमें रहने वाली विभिन्न जनजातियों (गोड़, बैगा, कोल, पनिका, खैरवार आदि) द्वारा विभिन्न प्रकार के उपयोग में लाये जाने वाले पौधों एवं उनके अंगों का वर्णन किया गया है। यह पौधे भोजन, दवाइयाँ, ईधन, कृषि उपकरण, मकान, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक रीति-रिवाजों में उपयोग किये जाते हैं। इस प्रकार जनजातियाँ सामाजिक आर्थिक तथा जीवन के प्रत्येक पक्ष में वनों एवं उनके उत्पादों पर निर्भर हैं। अतः वनों को विकसित एवं संरक्षित करके ही हम जनजातियों को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से उन्नत कर सकते हैं तथा उनके संस्कृति को जीवित रख सकते हैं।

 

शब्दकुंजी - बघेलखण्ड, जनजाति, पौधे

 


 

प्रिचय

वनों एवं वन अंचलों में रहने वाली जनजातियों को एवं पौधों के पारस्परिक संबन्धों का अध्ययन इथनोबाॅटनी कहा जाता है। मध्यप्रदेश में अनेक प्रकार की जनजातियां एवं वन पाये जाते हैं, यह अपने जीवन की जरूरतों को इन्हीं जंगली पौधों से पूर्ण करते हैं।

बघेलखण्ड मध्यप्रदेश के Ÿार-पूर्व में 23°45 से 25°90 उतरी अक्षांश एवं 80°25 से 83°58 पूर्वी देशांतर में स्थित होती है। इस क्षेत्र के वन शुष्क एवं आद्र उष्ण कटिबन्धीय प्रकार के हैं। इनमें कोल, बैगा, पनिका, खैरवार आदि जनजातियां निवास करती हैं। यह जनजातियां अपने भोजन, दवाइयों, ईधन, आर्थिक, सामाजिक, एवं धार्मिक रीति-रिवाजों के लिए जंगली पौधों का उपयोग करती है।

 

जनजातियां इन पौधों का उपयोग कई पीढ़ियों से करती चली रही है। विभिन्न प्रकार के पौधे के उपयोग की परम्परागत जानकारियां यह मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को देते हैं। यह महत्वपूर्ण जानकारियां बढ़ते हुए शहरीकरण, वनों के विनाश एवं आधुनिकता के कारण धीरे-धीरे समाप्त हो रही है, अतः आवश्यक है कि इन जानकारियों को खत्म होने के पूर्व लिपिबद्ध एवं संरक्षित किया जाय।

 

प्राप्त अभिलेखों से पता चलता है कि मध्यप्रदेश तथा विशेषकर बघेलखण्ड क्षेत्र की जनजातियों द्वारा उपयोगी पौधों के सम्बन्ध में अभी तक विस्तृत रूप से अध्ययन नहीं किया गया है। मध्यप्रदेश के इथनोबाॅटनी के संबन्ध में जैन, (1963 बी) साहू (1982) ओम्माचन एवं मसीह (1987) ओम्माचन, मसीह एवं श्रीवास्तव (1989) माहेश्वरी. पैइनुली एवं द्विवेदी (1990) ने तथा बघेलखण्ड क्षेत्र के संबन्ध में पाण्डे, एवं दास (1991) द्विवेदी एवं पाण्डेय, (1992) लाल एवं दुबे, (1992)  सिकरवार एवं माहेश्वरी, (1992) मिश्रा, तिवारी, दुबे एवं चटर्जी (1993)   तिवारी, एव मिश्रा (1994) सिंह साहू, मिश्रा एवं सिंह (2014) मिश्रा, (2015)  मिश्रा (2015) ने अध्ययन किया है।

 

विधि

बघेलखण्ड के जनजातियों द्वारा उपयोग किये जाने वाले पौधों के संबन्ध में अध्ययन हेतु क्षेत्र के वन अंचलों के वनस्पति एवं विभिन्न जनजातियों के 5-5 गांवों का सर्वेक्षण किया गया तथा प्रत्येक गांव के स्त्री, पुरूषों एवं वैद्यों से विभिन्न आवश्यकताओं हेतु उपयोग किये जाने वाले पौधे एवं उनके अंगों तथा उपयोग विधि के संबन्ध में जानकारी प्राप्त की गई। पौधों को एकत्रित करके फ्लोरा द्वारा उक्त पौधों की पहचान की गई। कुछ पौधों की पहचान बी.एस.आई. इलाहाबाद द्वारा कराई गई।

 

 

तालिका -1 जनजाति द्वारा उपयोग किये जाने वाले महत्वपूर्ण रोगों के उपचार हेतु औषधीय पौधे एवं उनके अंग।

क्र. स्थानीय नाम      वानस्पतिक नाम   कुल   उपयोगी अंग उपयोग

तीखुर

(वन हल्दी)     कुरकुमा अगस्तिफोलिया  जिन्जीबेरेसी राइजोम     बुखार, पीलिया के इलाज तथा देवताओं के प्रसाद हेतु

पपरा  गार्डीनिया लैटीफोलिया    रूबिएसी     छाल पावडर, Ÿाी   सर्पदंश, पशुओं के घाव में

खस, सींक  वेटिवेरिया जिजैनाॅयडेज  पोएसी जड़   जलने, बिच्छु डंक, दांत दर्द

तालमखाना  हाइग्रोफिला आॅरिकुलेटा  एकेन्थेसी    Ÿाी, बीज, पूरा पौघा     सब्जी हेतु, टाॅनिक, चेहरे के सूजन में

बकायन     मीलिया एडरैच     मीलिएसी    Ÿाी, बीज लकड़ी   रक्त शुद्धता तथा घाव हेतु तेल पेट के कीड़े मारने में, ईधन, सामाजिक तथा धार्मिक कार्यो में।

रामदतौन    स्माइलैक्स परफोलिएटा   स्माइलैकैसी पुष्प, जड़, Ÿाी   बच्चे होने में, सिफलिस गोनोरिया तथा मूत्र विकार में, बिस्तर में पेशाब करने वाले बच्चे को इसके Ÿाी में भोजन देते है।

सतावर      एसपरैगस रैसीमोसस     लीलिएसी    जड़ फल    जड़ का सत्व लैक्टेशन में तथा शक्तिवर्धक है फल का रस एक्जीमा में प्रयोग होता है।

वज्रदन्ती    बारलेरिया क्रिस्टाटा एकेन्थेसी    पौधे छाल   पौधे का सत्व क्षय रोगी, कुकर खांसी में तथा छाल कफ के लिये उपयोगी है।

बचनांग     एकोनाइटम रोटन्डीफोलियम     रैननकुलेसी  जड़   जड़ का प्रयोग ब्रान्काइटिस में होता है।

10 कालमेघ     एण्ड्रोग्रैफिस पैनीकुलैटा    एकैन्थेसी    पौधे पौधे का प्रयोग बुखार एवं सर्पदंश में होता है।

11 सफेदमुसली  क्लोरोफाइटम ट्यूबरोसम  लीलिएसी    ट्यूबर       ट्यूबर का प्रयोग बुखार, नाक के बहने तथा लैंगिक टाॅनिक हेतु होता है।

12 गुलबकावली हाइडेचियम कोरोनैरियम जिन्जीबेरेसी राईजोम     राईजोम का प्रयोग पशुओं में आंत के कीड़े मारने में किया जाता है।

13 धाय  बुडफोर्डिया फुटीकोसा     लायथ्रेसी    फल, फूल   चोट, खांसी, चेचक, सब्जी में

14 बाम्ह्री सेन्टेला एसीयाटिका     एपिएसी     पत्ती   पत्ती टाॅनिक में प्रयोग की जाती है।

15 हुरहुर क्लीओम गाइनेनड्रा क्लिओमेसी  पत्ती   पत्ती का रस कान के दर्द एवं बहने में प्रयोग किया जाता है।

16 तीखुर करकुमा अकस्तीफोलिया  जिन्जीबेरेसी जड़   जड़ का प्रयोग लू तथा कमजोरी हेतु किया जाता है।

17 कहुआ टर्मिनेलिया अर्जुना काम्ब्रेटेसी   छाल, Ÿाी      मछली के लिए विष, घाव

18 सेमल बाम्बैक्स सीबा     बाम्बाकैसी   पुष्प, लकड़ी, फल, बीज लैंगिक कमजोरी हेतु, ईधन कृषि उपकरण, रेशे, खाने में।

19 सर्पगन्धा    रावोल्फिया सरपेन्टिना    एपोसाइनेसी जड़   जड़ रक्त चाप तथा हृदय रोग के उपचार में उपयोगी हैं।

20 असगन्ध    विथेनिया सोमनीफेरा     सोलेनेसी    पत्ती   पत्ती रूहमेटिज्म के लिए उपयोगी है।

21 भारंगी क्लोरोडेन्ड्रम इन्डिकम    वर्बीनेसी     जड़, Ÿाी गोनोरिया, सिफलिस, सब्जी

22 धुवैन डलबर्जिया पैनीकुलैटा     फैबेसी छाल, लकड़ी चर्मरोग, कृषि उपकरण

23 अस्तु बाहिनिया रैसीमोसा सिसैलपीनिएसी    फल, एवं बीज     सब्जी में

24 साज  टर्मिनेलिया एलाटा  काम्ब्रेटेसी   Ÿाी, लकड़ी, पौधा    चारे के रूप में, वाद्य यंत्र बनाने में, देवता के रूप में माना जाता है।

25 गुरुच  टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया   मेनीस्पर्मेसी तना तने का सत्व नाक के बहने तथा पेस्ट हड्डी के जोड़ने एवं तने का काढ़ा धात रोग हेतु उपयोगी है।

26 सामा इक्निोक्लोआ पोएसी बीज  उबाल कर खाया जाता है।

27 जंगली भिण्डी      एबेलमाॅसकस मैनीहाट   माल्वेसी     कैप्सूल, बीज, Ÿाी   खाने योग्य

28 बंास       डेन्ड्रोकैलमस स्ट्रीकटस    पोएसी तना, कल्म, फूल  ईधन, फर्नीचर, टोकरी बनाने में, खाने में, अपशगुन के रूप में।

29 कलियारी    ग्लोरिओसा सुपरवा      लिलिएसी    जड़ पत्ती     जड़ का रोहमेटिजम तथा पत्ती अस्थमा हेतु उपयोगी है।

30 निर्गुन्डी     वाइटेक्स निगुन्डो वर्बीनेसी     पत्ती   पत्ती चोट, जलने एवं फफोले में प्रयोग की जाती है।

 

 

निष्कर्ष एवं सुझाव

उपरोक्त अध्ययन से पता चलता है कि इस क्षेत्र में निवास करने वाली जनजातियां अपने आवश्यकता के वस्तुओं को वनों से एकत्रित करती है तथा पौधों के विभिन्न अंगों जड़, तना, Ÿाी, बीज, फल, छाल लकड़ी फूल आदि को औषधि भोजन, ईधन, कृषि उपकरण, सामाजिक धार्मिक रीति-रिवाजों एवं आर्थिक महत्व हेतु उपयोग करती हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में पुष्पीय पौधे के 24 कुलों के 30 पौधों का वर्णन किया गया है। इनमें से अनेक पौधे अत्याधिक उपयोग के कारण तथा वनों के विनाश के कारण इन वनों में बहुत थोडे़ ही रह गये हैं, इनका संरक्षण किया जाना अति आवश्यक है। इन पौधों का उचित संरक्षण, रोपण एवं सतत उपयोग तथा इनके द्वारा प्राप्त उत्पादों को बेचने हेतु बाजार उपलब्ध कराकर जनजातियों के जीवन स्तर को विकसित किया जा सकता है।

 

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Received on 20.02.2017       Modified on 22.03.2017

Accepted on 28.03.2017      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(1):16-18.